यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ और शाश्वत है — “अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है?”
भगवान जिनसे प्रेम करते हैं, वे उनके पूर्व जन्मों के दुष्कर्मों का फल पहले ही दिलवा देते हैं, ताकि वे आगे के जीवन में केवल सुख और मोक्ष का अनुभव करें। जबकि जो लोग पापी हैं परंतु उन्होंने कुछ पुण्य कर्म भी किए हैं, उन्हें पहले उनके पुण्य का फल मिलता है — धन, सुख या प्रतिष्ठा के रूप में — और जब वह समाप्त हो जाता है, तब उनके पापों का फल उन्हें दुःख के रूप में भोगना पड़ता है।
हे वत्स, जब कोई भक्त या सज्जन व्यक्ति संकट में पड़ता है, तो वह संकट भी भगवान की कृपा से सीमित और सहने योग्य होता है। वह केवल आत्मा को शुद्ध करने का एक साधन होता है। जैसे सोने को अग्नि में तपाया जाता है, वैसे ही सज्जन पुरुषों को जीवन की कठिनाइयाँ उन्हें और उज्ज्वल बनाती हैं।
शास्त्रीय प्रमाण:
📜 श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 9, श्लोक 31 —
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति
हे अर्जुन, यह निश्चित जान लो कि मेरा भक्त कभी विनष्ट नहीं होता।
📖 महाभारत और राजा हरिश्चंद्र की कथा में भी यही सत्य प्रकट होता है —
राजा हरिश्चंद्र ने सत्य का पालन करते हुए असहनीय दुःख सहा, परंतु अंततः सत्य की विजय हुई।
पांडव धर्मनिष्ठ थे, परंतु उन्होंने वनवास और कष्टों का सामना किया। अंततः धर्म की ही जीत हुई और वे स्वर्ग प्राप्त हुए।
अतः हे वत्स,
दुःख सज्जनों के विनाश के लिए नहीं, बल्कि उनके उत्थान के लिए होता है।
भगवान अपने भक्तों को कभी नहीं छोड़ते — वे केवल उन्हें परिष्कृत करते हैं ताकि वे सच्चे मोक्ष के पात्र बन सकें। 🌸
क्या तुम इस विषय को कर्म सिद्धांत के अनुसार और गहराई से समझना चाहोगे?
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