“कौन-सा भक्त ऐसा हुआ जिसने भागवत प्राप्ति के बाद सार्ष्टि-मोक्ष, अर्थात् भगवान के समान ऐश्वर्य और सामर्थ्य, प्राप्त किया?”

यह प्रश्न अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि अधिकांश भक्त — जैसे गोपीगण, हनुमानजी, नारदजी — मोक्ष या ऐश्वर्य की इच्छा नहीं रखते,
परंतु कुछ महाभागवत ऐसे भी हुए हैं जिन्हें भगवान ने अपनी इच्छा से अपना ऐश्वर्य प्रदान किया,
न कि उन्होंने माँगा।

अब मैं तुम्हें शास्त्रों के अनुसार ऐसे कुछ महान उदाहरण बताता हूँ जिनके जीवन में “सार्ष्टि-मोक्ष” की अनुभूति प्रकट हुई।


🌼 १. भगवान विष्णु के अनन्य भक्त — राजा पृथु

स्रोत: श्रीमद्भागवतम् चतुर्थ स्कंध (अध्याय 20–23)

राजा पृथु भगवान के अंशावतार माने गए हैं,
किन्तु वे स्वयं को सदा “भगवद् दास” मानते थे।

जब उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन धर्मपूर्वक किया और भगवान विष्णु के चरणों में अपना राज्य समर्पित कर दिया,
तब भगवान विष्णु स्वयं उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें वर प्रदान किया —

“मया तुल्यं ऐश्वर्यं ते दास्ये, यत् तव भक्त्यनुग्रहम्।”
— (भागवत 4.20.15 के भावानुसार)

अर्थात् —
“हे पृथु! तुझे मैं अपने समान ऐश्वर्य और सामर्थ्य प्रदान करता हूँ,
क्योंकि तूने सब कुछ मेरे लिए किया है।”

🌺 भावार्थ:
यह सार्ष्टि-मोक्ष का प्रत्यक्ष उदाहरण है —
पृथु महाराज को वैकुण्ठ समान ऐश्वर्य मिला,
पर उन्होंने उसे “भगवान की सेवा” के साधन के रूप में ही स्वीकार किया,
न कि भोग के रूप में।


🌼 २. ध्रुव महाराज — बालभक्त जिन्हें “वैकुण्ठ तुल्य सामर्थ्य” प्राप्त हुआ

स्रोत: श्रीमद्भागवतम् चतुर्थ स्कंध, अध्याय 9–12

ध्रुवजी ने प्रारंभ में राजसिंहासन की कामना की थी,
परंतु जब उन्होंने भगवान विष्णु के दर्शन किए, तो उन्होंने कहा —

“स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि, वरं न याचे।”
— (भागवत 4.9.6)
“हे प्रभु, मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब कोई वर नहीं चाहता।”

फिर भी भगवान विष्णु ने उन्हें वर दिया —

“तव लोकः मया तुल्यः भविष्यति।”
— “तुम्हारा लोक मेरे लोक के समान होगा।”

👉 यही ध्रुवलोक आज “ध्रुव तारा” के रूप में आकाश में स्थित है —
जो सृष्टि के अंत तक अचल रहता है।

🌼 यह पूर्ण “सार्ष्टि-मोक्ष” का उदाहरण है।
ध्रुव को भगवान ने अपना ही समान ऐश्वर्य और अमरता दी,
परंतु उन्होंने उसे भोग के रूप में नहीं, भक्ति के प्रसाद के रूप में स्वीकार किया।


🌼 ३. प्रह्लाद महाराज — जिनमें भगवान का ऐश्वर्य प्रकट हुआ

स्रोत: श्रीमद्भागवतम् सप्तम स्कंध, अध्याय 9–10

जब भगवान नृसिंहदेव ने हिरण्यकशिपु का वध किया,
तो उन्होंने प्रह्लाद से वर माँगने को कहा।

प्रह्लाद बोले —

“नैवोद्विजे पर दुरत्यय वैतरण्याः,
त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्तः।”
— (भागवत 7.9.43)
“हे प्रभो, मुझे मोक्ष नहीं चाहिए;
मुझे तो केवल आपका नाम गाने का अवसर चाहिए।”

परंतु भगवान नृसिंह ने कहा —

“हे प्रह्लाद, तुझे न केवल भक्तिभाव,
बल्कि अपने समान बल, तेज और ऐश्वर्य भी प्राप्त हो।”

इस प्रकार प्रह्लाद को भगवान के समान “तेज, बल, ज्ञान और योगसिद्धियाँ” प्राप्त हुईं।
वे नृसिंह के समान “परम निर्भय” और “अद्वितीय तेजस्वी” बन गए —
यह भी सार्ष्टि-मोक्ष का रूप है।


🌼 ४. अम्बरीष महाराज — राजसी वैभव में रहकर भी भगवान तुल्य ऐश्वर्य

स्रोत: श्रीमद्भागवतम् नवम स्कंध, अध्याय 4–5

अमरीषजी भगवान के परम भक्त थे,
वे राजमहल में रहते हुए भी पूर्ण वैराग्ययुक्त थे।

भगवान विष्णु ने स्वयं कहा —

“अमरीषो वै भक्तश्रेष्ठः, यस्य सर्वाङ्गेषु अहं प्रतिष्ठितः।”

दुर्वासा मुनि जैसे महायोगी भी उनके तेज से प्रभावित हुए।
विष्णु चक्र ने उनकी रक्षा की और स्वयं भगवान बोले —

“हे मुनि, मेरे भक्त की रक्षा के बिना मैं भी असमर्थ हूँ।”

🌺 यह क्या बताता है?
कि भगवान ने अपने भक्त को अपने तुल्य सामर्थ्य (सार्ष्टि) प्रदान किया।
विष्णु चक्र जो भगवान का आयुध है, वह अमरीष की सेवा में लगाया गया।


🌼 सारांश

भक्तभगवानसार्ष्टि रूप में प्राप्त ऐश्वर्यभाव
पृथु महाराजविष्णुसमान शासन और तेजसेवा हेतु उपयोग
ध्रुव महाराजविष्णुध्रुवलोक – वैकुण्ठ तुल्य लोकमोक्ष से ऊपर की अवस्था
प्रह्लाद महाराजनृसिंहदिव्य तेज, बल, योगसिद्धियाँकेवल भगवान के नाम में लीन
अमरीष महाराजविष्णुभगवान तुल्य प्रभाव, चक्र संरक्षणनिष्काम कर्मयोगी भक्त

🌼 निष्कर्ष

हे वत्स,
जो भक्त भगवान की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देता है,
वह माँगता नहीं, परंतु भगवान उसे अपने समान बना देते हैं।

यह है सार्ष्टि-मोक्ष
जहाँ भगवान और भक्त का वैभव समान हो जाता है,
परंतु भाव भिन्न रहता है —

भगवान स्वामी हैं, भक्त दास है;
पर दोनों के हृदय में एक ही प्रेम धारा बहती है।

भक्त का ऐश्वर्य उसकी सेवा का साधन होता है, अहंकार का कारण नहीं।
यही सच्चे सार्ष्टि-मोक्ष का रहस्य है।

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