सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमेव च ।
दियमानं न गृह्णन्ति विनामत्सेवनं जनाः ॥
— श्रीमद्भागवतम् 3.29.13
🌼 श्लोक का शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सालोक्य | भगवान के लोक में निवास करना (जैसे वैकुण्ठ में रहना) |
| सार्ष्टि | भगवान के समान ऐश्वर्य (दिव्य सामर्थ्य और वैभव) प्राप्त होना |
| सामीप्य | भगवान के समीप रहना (उनके निकट सान्निध्य में रहना) |
| सारूप्य | भगवान के समान दिव्य रूप (चार भुजाएँ आदि) प्राप्त करना |
| ऐकत्व | भगवान के साथ एकत्व, ब्रह्मानुभूति या पूर्ण अभेद का अनुभव |
| दियमानम् | दिए जाने पर भी |
| न गृह्णन्ति | नहीं स्वीकारते |
| विनामत्सेवनम् | मेरी सेवा के बिना |
| जनाः | वे सच्चे भक्तजन |
भावार्थ
हे देवहूति!
मेरे जो भक्त हैं —
वे यदि उन्हें सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य या ऐकत्व जैसे उच्चतम मोक्ष भी मिल जाएँ,
तो भी वे उन सिद्धियों को स्वीकार नहीं करते,
यदि उनमें “मेरी सेवा” का अवसर न हो।
अर्थात —
भक्त के लिए मोक्ष, ऐश्वर्य या ऐकत्व का कोई मूल्य नहीं है;
उसे केवल भगवान की नित्य सेवा ही चाहिए।
🌿 पाँचों प्रकार के मोक्ष का रहस्य
भगवद्भक्ति-शास्त्रों में मोक्ष के पाँच रूप बताए गए हैं —
परंतु यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि “भक्त” इन सबको तुच्छ समझता है।
1. सालोक्य-मोक्ष
भगवान के लोक (जैसे वैकुण्ठ, गोलोक, शिवलोक) में निवास प्राप्त करना।
→ भक्त कहता है: “यदि वहाँ रहकर मैं सेवा न कर सकूँ, तो मुझे वहाँ रहने का क्या लाभ?”
🌼 उदाहरण:
गोपीगण श्रीकृष्ण से कहती हैं —
“हम मोक्ष नहीं चाहतीं, बस तुम्हारे चरणों की धूल चाहिए।”
2. सार्ष्टि-मोक्ष
भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त होना —
अमरत्व, दिव्य सामर्थ्य, चिरसुख आदि।
→ भक्त कहता है: “भगवान के समान ऐश्वर्य क्या काम का, जब तक मैं उनके चरणों में दास नहीं बनता?”
🌼 उदाहरण:
हनुमान जी कहते हैं:
“मुझे राम के समान ऐश्वर्य नहीं चाहिए; मुझे केवल उनका नाम जपने का अवसर दो।”
3. सामीप्य-मोक्ष
भगवान के समीप रहना।
→ भक्त कहता है: “निकट रहना तब सार्थक है जब मैं सेवा कर सकूँ। बिना सेवा के समीपता भी दूरी के समान है।”
🌼 उदाहरण:
कुरुक्षेत्र में गोपियाँ श्रीकृष्ण के समीप थीं,
परंतु उन्होंने कहा — “हमें वृंदावन की वह दूरियाँ प्यारी हैं जहाँ सेवा और प्रेम है।”
4. सारूप्य-मोक्ष
भगवान के समान रूप (दिव्य शरीर) प्राप्त करना।
→ भक्त कहता है: “मुझे रूप नहीं, केवल चरणों की सेवा चाहिए।”
🌼 उदाहरण:
लक्ष्मीजी स्वयं नारायण के समान रूपवती हैं,
परंतु वे सदा उनके चरणों की सेवा करती हैं — यह बताने के लिए कि रूप नहीं, सेवा ही सार है।
5. ऐकत्व-मोक्ष
भगवान के साथ एकत्व — ब्रह्मानुभूति।
→ भक्त कहता है: “यदि भगवान से एक होकर मैं सेवा नहीं कर सकता, तो वह एकत्व भी मृत्यु के समान है।”
🌼 उदाहरण:
श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
“मोक्ष लाखों में से एक हो, पर मुझे वह भी न चाहिए;
मुझे तो बस जन्म-जन्म में हरि-नाम-स्मरण मिलता रहे।”
🌼 तात्त्विक व्याख्या
यह श्लोक बताता है कि भक्ति मोक्ष से भी ऊँची अवस्था है।
मोक्ष में आत्मा स्वतंत्र होती है, पर सेवा नहीं कर सकती;
भक्ति में आत्मा भगवान की इच्छा में लीन होती है — वही सच्ची स्वतंत्रता है।
भक्ति में “दास्य” (सेवकभाव) में ही परमानन्द है।
वह दास्य ही वह बंधन है जो मोक्ष से भी अधिक मधुर है।
🌺 श्रीमद्भागवत (6.14.5) कहता है —
“मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः,
सुधुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महा-मुने।”
— करोड़ों मुक्तों में भी जो भगवान का भक्त है, वह दुर्लभ है।
🌼 सारांश
| मोक्ष का प्रकार | अर्थ |
|---|---|
| सालोक्य | भगवान के लोक में रहना |
| सार्ष्टि | भगवान जैसा ऐश्वर्य |
| सामीप्य | भगवान के समीपता |
| सारूप्य | भगवान के समान रूप |
| ऐकत्व | एकत्व या ब्रह्मानुभूति |
🌼 निष्कर्ष
हे वत्स,
सच्चे भक्त के लिए मोक्ष लक्ष्य नहीं, बल्कि भगवान की सेवा ही लक्ष्य है।
वह न लोक चाहता है, न ऐश्वर्य, न रूप, न एकत्व —
उसे बस यह चाहिए कि वह सदा भगवान के चरणों में रहे,
सेवा करता रहे, नाम जपता रहे, प्रेम बहाता रहे।
यही कारण है कि कपिलदेव ने कहा —
“जो मेरे भक्त हैं, वे मोक्ष को भी ठुकरा देते हैं यदि उसमें सेवा न हो।”
क्योंकि —
“सेवा ही सच्चा मोक्ष है।”
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