हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ है — भागवत प्राप्ति (भगवान की परम अनुभूति) के बाद यदि कोई जीव मोक्ष नहीं चाहता, तो उसकी स्थिति शास्त्रों में विशिष्ट रूप से बताई गई है।

देखो वत्स —

जब कोई जीव भगवान की पूर्ण अनुभूति प्राप्त कर लेता है, अर्थात उसे यह अनुभूति हो जाती है कि “मैं और भगवान अलग नहीं हैं, परंतु भगवान मेरे स्वामी हैं और मैं उनका शुद्ध दास हूँ” — तब उस अवस्था में उसके भीतर मोक्ष की इच्छा भी लुप्त हो जाती है।

🌼 1. भक्ति मार्ग में मोक्ष से भी ऊपर की अवस्था

श्रीमद्भागवतम् (३.२९.१३) में भगवान कपिलदेव माता देवहूति से कहते हैं –

सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमेव च ।
दियमानं न गृह्णन्ति विनामत्सेवनं जनाः ॥

अर्थ:
जो मेरे भक्त हैं, वे सालोक्य (मेरे लोक में निवास), सार्ष्टि (मेरे समान ऐश्वर्य), सामीप्य (मेरे समीप रहना), सारूप्य (मेरे समान रूप), या ऐकत्व (एकता) — इन सब प्रकार के मोक्ष को भी नहीं चाहते, यदि उन्हें उसमें मेरी सेवा का अवसर न मिले।

🕉️ अर्थात — सच्चे भक्त के लिए मोक्ष भी गौण है।
वह भगवान के चरणों की सेवा को ही सर्वोच्च मानता है।


🌼 2. ऐसी स्थिति वाले जीव की अवस्था क्या होती है?

जो व्यक्ति भागवत प्राप्ति के बाद भी मोक्ष नहीं चाहता, उसकी स्थिति होती है —
“नित्य-सेवा-भाव” में स्थित होना।
वह मुक्त होकर भी संसार में भगवान की लीला में उनके साधन के रूप में कार्य करता है।

ऐसा जीव “जीवन-मुक्त” कहलाता है।
वह शरीर में रहते हुए भी बंधन से मुक्त होता है, परंतु वह भगवान की इच्छा से लोककल्याण हेतु शरीर धारण करता है।


🌼 3. उदाहरण के रूप में

  1. श्री नारद जी — उन्हें ब्रह्मज्ञान और भगवत-साक्षात्कार दोनों प्राप्त हैं, परंतु वे मोक्ष नहीं चाहते; वे तो सदा भगवान के नाम और कथा का प्रचार करते रहते हैं।

  2. हनुमान जी — वे स्वयं कहते हैं:

    “भवबन्धछेदोऽपि न चैतदिष्टं — मुझे संसारबंधन से मुक्ति भी प्रिय नहीं, मुझे तो केवल प्रभु राम की सेवा ही चाहिए।”

  3. गोपीगण — वे न तो स्वर्ग चाहती थीं, न मोक्ष; वे केवल भगवान श्रीकृष्ण की नित्य सेवा और दर्शन की कामना करती थीं।


🌼 4. निष्कर्ष

हे वत्स,
जो भगवत् प्राप्त जीव मोक्ष नहीं चाहता, वह भगवान के नित्य सेवक रूप में स्थित हो जाता है।
उसका जीवन अब भगवान की लीला और इच्छा का अंग बन जाता है।
ऐसे भक्त मुक्त होकर भी लोक में रहते हैं, और उनकी हर क्रिया भगवान की प्रेरणा से होती है।

जैसे श्रीकृष्ण कहते हैं —

“मद्भक्तो लभते पराम्” — मेरा भक्त परम अवस्था को प्राप्त करता है (गीता 18.54)।

पर वह “परम अवस्था” मोक्ष नहीं, सेवा-रस की अनंत अनुभूति है।


हे वत्स,
मोक्ष वह चाहता है जो अभी तक ईश्वर में लीन नहीं हुआ,
पर जो सच्चा “भागवत-प्राप्त” है,
उसके लिए भगवान की सेवा ही मोक्ष है —
और वही उसकी शाश्वत स्थिति है।

Posted in

Leave a comment