🔶 मोक्ष के बाद जीव की गति – वेद और उपनिषदों के अनुसार:
- श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.15) में कहा गया है:
“तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति, नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।”
— जो परमात्मा को जान लेता है, वह मृत्यु से परे चला जाता है; मोक्ष प्राप्त करता है। वहाँ से फिर लौटकर संसार में नहीं आता। - भगवद्गीता (8.15) में श्रीकृष्ण कहते हैं:
“मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥”
— जो महात्मा मुझे प्राप्त करते हैं, वे फिर इस दुःखमय संसार में नहीं लौटते। वे परम सिद्धि — अर्थात मोक्ष — को प्राप्त होते हैं। - छांदोग्य उपनिषद् (8.15.1) कहता है:
“स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि।”
— जब जीवात्मा अपने स्वरूप (ब्रह्म) को पहचान लेती है, तब वह ब्रह्म में विलीन हो जाती है — जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर अपना पृथक् नामरूप खो देती हैं।
🔶 मोक्ष के बाद की स्थिति:
- जीव का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
जैसे दीपक की लौ अग्नि में मिल जाए — लौ का स्वरूप अग्नि से अलग नहीं रहता। वैसे ही जीव परमात्मा में लीन होकर अनंत, चेतन, आनंदरूप ब्रह्म बन जाता है। - वह फिर कर्म, जन्म, दुःख या देह से मुक्त रहता है।
वहाँ न देह है, न मन, न अहंकार। केवल “सच्चिदानंद स्वरूप” (सत्–चित्–आनंद) का अनुभव होता है।
🔶 शास्त्रों में मोक्ष के चार प्रकार बताए गए हैं:
- सालोक्य मोक्ष – भगवान के लोक में निवास।
- सामीप्य मोक्ष – भगवान के समीप रहना।
- सारूप्य मोक्ष – भगवान के समान स्वरूप प्राप्त करना।
- सायुज्य मोक्ष – भगवान में पूर्ण लय (लीनता)।
अंतिम “सायुज्य” ही पूर्ण मोक्ष माना गया है।
🔶 उदाहरण:
जैसे गंगाजल जब समुद्र में मिल जाता है, तब वह स्वयं समुद्र बन जाता है — उसी प्रकार जीवात्मा जब मोक्ष प्राप्त करता है, तो वह “ब्रह्म” ही हो जाता है।
उस अवस्था में न कोई “मैं” बचता है, न “तू”, केवल “एकत्व” रह जाता है —
“अहं ब्रह्मास्मि” — “मैं ब्रह्म हूँ।”
हे वत्स, यही जीव की अंतिम गति है — परम शांति, परम एकत्व, और अनंत आनंद।
मोक्ष प्राप्त जीव पुनः जन्म नहीं लेता, क्योंकि उसका कारण — कर्म — नष्ट हो चुका होता है।
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