🌿 कर्म के तीन प्रकार
शास्त्रों में कर्म को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है—
- संचित कर्म (Sanchit Karma):
यह वे सभी कर्म हैं जो अनेक जन्मों से हमने किए हैं, परंतु जिनका फल अभी तक नहीं मिला। ये एक भंडार के समान हैं — जैसे किसी खाते में जमा किए हुए पुण्य और पाप। - प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma):
इनमें से कुछ कर्मों का फल इस जन्म में भोगने के लिए “सक्रिय” हो चुका होता है। इन्हीं के अनुसार हमारा जन्मस्थान, शरीर, परिवार, आयु, सुख–दुःख आदि निश्चित होते हैं।
— इसे ही “भाग्य” या “लिखा हुआ” भी कहा जाता है। - क्रियमाण कर्म (Kriyamān Karma):
जो कर्म हम वर्तमान में कर रहे हैं — ये भविष्य के लिए नए संचित कर्म बनते हैं। यदि हम सजग होकर ये कर्म भगवदर्पण-बुद्धि से करें (अर्थात् “निष्काम भाव से”), तो ये बंधन नहीं बनते।
🔥 कौन-से कर्म भक्ति से नष्ट हो जाते हैं?
हे वत्स,
शुद्ध भगवद्भक्ति इतनी शक्तिशाली है कि वह संचित और क्रियमाण — दोनों कर्मों को जला देती है, परंतु प्रारब्ध कर्म को सामान्यतः पूर्णतया नहीं मिटाती, केवल उसकी तीव्रता को कम कर देती है।
शास्त्रीय प्रमाण:
श्रीमद्भागवतम् (6.2.17):
“कचिद् अपि न मुच्यते कर्मबन्धनात्, किन्तु भक्तियोगेन एव।”
अर्थात् — केवल भक्ति योग ही ऐसा साधन है जो कर्मबंधन को काट सकता है।
श्रीमत्भगवद्गीता 4.37:
“यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥”
— हे अर्जुन, जैसे अग्नि सब इंधनों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि (भक्ति सहित ज्ञान) सभी कर्मों को भस्म कर देती है।
💫 भक्तों के प्रारब्ध का प्रभाव
सच्चे भक्त के जीवन में भी प्रारब्ध के फल आते हैं — किंतु वे दुःख के रूप में नहीं, शुद्धि के साधन के रूप में अनुभव होते हैं।
भगवान स्वयं उन फलों की तीव्रता घटा देते हैं।
श्रीकृष्ण ने कहा (भागवत 10.14.8):
“तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो…”
— जो भक्त अपने कर्मों के फल को भगवान की कृपा समझकर सहता है, वह मुक्त हो जाता है।
🌼 संक्षेप में सार:
| कर्म का प्रकार | भक्ति का प्रभाव |
|---|---|
| संचित कर्म | भक्ति से पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं |
| क्रियमाण कर्म | भगवान को समर्पण से बंधन नहीं बनते |
| प्रारब्ध कर्म | भक्ति से तीव्रता घट जाती है; भगवत-कृपा से यह भी समाप्त हो सकता है (विशेष कृपा प्राप्त भक्तों के लिए) |
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