हे वत्स, तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत गूढ़, गंभीर और दिव्य है — ऐसा प्रश्न वही पूछता है जिसका हृदय ज्ञान की ओर जाग्रत हो चुका हो।
“आत्मा, परमात्मा और गुरु में कौन सर्वोच्च है?”
यह त्रिवेणी एक ही सत्य की तीन अवस्थाएँ हैं — जैसे सूर्य, उसका प्रकाश, और उसकी ऊष्मा — तीन हैं, परंतु अलग नहीं।
चलो इसे शास्त्रों के आलोक में विस्तार से समझें।
🌼 १. आत्मा (Individual Soul)
आत्मा वह चेतन तत्व है जो शरीर में “मैं हूँ” का अनुभव कराता है।
यह अविनाशी, अजर-अमर, साक्षीभाव से युक्त है।
परंतु अज्ञानवश आत्मा स्वयं को शरीर और मन से जोड़ लेती है और बंधन में आ जाती है।
गीता (2.20) में श्रीकृष्ण कहते हैं —
“न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।”
— आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है; वह सनातन, नित्य और शाश्वत है।
अतः आत्मा ईश्वर का ही अंश है, परंतु सीमित चेतना में बंधी हुई।
🌞 २. परमात्मा (Supreme Soul)
परमात्मा वह सर्वव्यापक चेतना है, जो सब आत्माओं का स्रोत और आधार है।
वह न तो जन्म लेता है, न मरता है, और न ही किसी बंधन में आता है।
वही सत्य, चैतन्य और आनंद का परम कारण है — “सच्चिदानंद स्वरूप।”
गीता (15.7) में कहा गया है —
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।”
— यह जीवात्मा मेरी ही सनातन अंश है।
अर्थात आत्मा परमात्मा से निकला हुआ चेतन कण है, जैसे सूर्य से किरण।
🌿 ३. गुरु (Spiritual Master)
गुरु वह प्रकाश है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
वह आत्मा को उसके मूल स्रोत — परमात्मा — की याद दिलाता है।
शास्त्र कहते हैं:
“गु” अंधकार का, “रु” प्रकाश का द्योतक है।
जो अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले जाए, वही गुरु है।
श्री गुरु गीता (श्लोक 17) में कहा गया है —
“गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णुः गुरु देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
अर्थात — गुरु ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता), और महेश (संहारकर्ता) — तीनों का स्वरूप है।
वह साक्षात् परमात्मा का प्रत्यक्ष रूप है जो जीव को परम तत्व से जोड़ता है।
🔱 ४. कौन सर्वोच्च है?
अब हे वत्स, जानो —
इन तीनों में कोई वास्तविक भेद नहीं, केवल स्थिति का भेद है।
| स्थिति | स्वरूप | कार्य |
|---|---|---|
| आत्मा | अंश (जीव) | अनुभव करता है, साधना करता है |
| गुरु | मार्गदर्शक | आत्मा को ज्ञान देता है |
| परमात्मा | परम स्रोत | सबका आधार और लक्ष्य |
इसलिए,
जब आत्मा अज्ञान में है, तो गुरु सर्वोच्च है,
क्योंकि वही आत्मा को परमात्मा तक ले जाता है।
पर जब आत्मा ज्ञान प्राप्त कर लेती है और परमात्मा में एकरूप हो जाती है, तब
तीनों एक ही स्वरूप बन जाते हैं — ‘अहं ब्रह्मास्मि’।
🌸 ५. शास्त्रीय प्रमाण:
- कठोपनिषद् (1.2.23) — “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥”
— आत्मा का साक्षात्कार केवल उसी को होता है जिसे गुरु और परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है। - गुरु गीता (श्लोक 53) — “गुरुवाक्यं ब्रह्मवाक्यं सत्यं सत्यं न संशयः।”
— गुरु का वचन ब्रह्म का ही वचन है।
🌷 निष्कर्ष:
हे वत्स,
जब तक आत्मा अंधकार में है, गुरु सर्वोच्च है;
जब ज्ञान प्राप्त हो जाए, परमात्मा सर्वोच्च है;
और जब एकत्व की अनुभूति हो जाए, तब आत्मा, परमात्मा और गुरु — तीनों एक हो जाते हैं।
“गुरु ही परमात्मा है, और परमात्मा ही आत्मा का स्वरूप है।”
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