हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ और सुंदर है — यह आत्मा के द्वंद्व को प्रकट करता है: एक ओर भौतिक सुख और सफलता की चाह, और दूसरी ओर भगवान की प्राप्ति की आकांक्षा

शास्त्रों में इस विषय पर गहन विवेचन मिलता है। चलो इसे तीन दृष्टिकोणों से समझते हैं — (१) कर्म योग, (२) भक्तियोग, और (३) ज्ञान योग


🌿 (१) कर्म योग का दृष्टिकोण:

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है:

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
(गीता 2.47)
— तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।

इसका अर्थ यह नहीं कि सफलता या भोग बुरा है, बल्कि यह कि उन्हें भगवान के प्रति समर्पण भाव से किया जाए, अपने स्वार्थ के लिए नहीं।
यदि तुम सांसारिक कर्म करते हुए भी निष्काम भाव (यानी फल की आसक्ति त्यागकर) रखो, तो वही कर्म योग कहलाता है। ऐसे व्यक्ति को सफलता भी मिलती है, और अंततः भगवान भी।


🌺 (२) भक्तियोग का दृष्टिकोण:

भगवान कहते हैं:

“यो यच्छ्रद्धः स एव सः।”
(गीता 17.3)
— मनुष्य जैसा श्रद्धा रखता है, वैसा ही वह बन जाता है।

यदि कोई व्यक्ति सांसारिक कार्यों में लगा है, परंतु उसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम है — तो वह भी धीरे-धीरे शुद्ध होता जाता है।
भगवान स्वयं कहते हैं:

“अपि चेत्सुदुराचारो भक्तो मामनन्यभाक्, साधुरेव स मन्तव्यः।”
(गीता 9.30)
— यदि कोई व्यक्ति दुर्आचार हो, परंतु मेरी भक्ति में एकनिष्ठ है, तो वह साधु ही है।

अर्थात — सांसारिकता कोई बाधा नहीं, यदि भीतर भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण हो।


🔱 (३) ज्ञान योग का दृष्टिकोण:

जो व्यक्ति संसार में रहते हुए यह समझ लेता है कि सब कुछ क्षणिक और नश्वर है, और जो भी सफलता मिलती है वह भी ईश्वर की कृपा है — वही व्यक्ति असक्त रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।
वेद कहते हैं:

“तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा।”
(ईशोपनिषद् 1)
— जो ईश्वर से प्राप्त है, उसका त्यागभाव से भोग करो।

अर्थात, भोग भी करो, परंतु यह समझते हुए कि यह सब ईश्वर का प्रसाद है, न कि मेरी अपनी कमाई या अधिकार।


🌞 निष्कर्ष:

हे वत्स, भगवान की प्राप्ति भोग का त्याग करने से नहीं, बल्कि भोग के प्रति आसक्ति का त्याग करने से होती है।
यदि तुम संसार में रहते हुए भी भगवान को अपने हर कर्म का साक्षी मानो, और सफलता को भगवान की देन समझो, तो वही संसार तुम्हारे लिए साधना बन जाएगा।


उदाहरण:

  • श्रीकृष्ण स्वयं गृहस्थ थे, राजकाज भी करते थे, परंतु पूरी तरह ईश्वरस्वरूप बने रहे।
  • राजा जनक — “विदेह” कहलाए, क्योंकि राजपाट में रहते हुए भी भीतर से विरक्त थे।

अतः,

“संसार में रहो, पर संसार तुम्हारे भीतर न बसने दो।”
यही भोग और भगवद्प्राप्ति के संतुलन का रहस्य है।

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