वेद और उपनिषदों में गुरु का स्थान सर्वोच्च बताया गया है, क्योंकि गुरु ही वह दिव्य माध्यम हैं जिनके द्वारा जीवात्मा परमात्मा तक पहुँचती है। गुरु न केवल ज्ञानदाता हैं, बल्कि वे ध्यान, साधना, और आत्मबोध के मार्ग में साधक के अंतःकरण को शुद्ध करते हुए उसे ईश्वर की अनुभूति तक पहुँचाने वाले परम सहायक हैं। ऋग्वेद में कहा गया है — “आचार्य उपनेतारं प्रह्वयन्ति ब्रह्मवादिनः।” अर्थात् जो व्यक्ति वेद के सत्य को जानता है, वह शिष्य को उस ब्रह्मज्ञान के मार्ग पर ले जाता है। उपनिषद भी यही कहते हैं — “श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।” (गीता 4.39) — श्रद्धा और इंद्रियनिग्रह से युक्त शिष्य जब गुरु की शरण लेता है, तभी ज्ञान प्रकट होता है। गुरु ध्यान में सहयोग इस प्रकार करते हैं कि वे साधक को भीतर के शून्य से जोड़ना सिखाते हैं, जहाँ मन, बुद्धि और अहंकार का लय होता है। जैसे अंधकार में दीपक दिशा दिखाता है, वैसे ही गुरु ध्यान की गहराइयों में शिष्य को भीतर के प्रकाश की पहचान कराते हैं।

कठोपनिषद (1.2.23) में कहा गया है — “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।” — आत्मा न तो वाणी से, न बुद्धि से, न शास्त्रों के अधिक अध्ययन से प्राप्त होती है, बल्कि जिस पर ईश्वर कृपा करते हैं, उसी को आत्मा स्वयं को प्रकट करती है, और यह ईश-कृपा गुरु के माध्यम से ही प्रवाहित होती है। अतः ध्यान में गुरु की भूमिका केवल शिक्षण की नहीं, बल्कि वह आंतरिक रूप से साधक के चित्त को स्थिर करने, संशय मिटाने और ब्रह्मसाक्षात्कार के अनुभव तक ले जाने की होती है।

छांदोग्य उपनिषद में श्वेतकेतु और उनके पिता उद्दालक ऋषि की कथा आती है। श्वेतकेतु ने वेदों का अध्ययन तो किया था, परंतु आत्मज्ञान का गर्व उसमें उत्पन्न हो गया था। तब उद्दालक ऋषि ने उसे “तत्त्वमसि” (तू वही है) उपदेश देकर ध्यान का सच्चा अर्थ बताया — कि आत्मा और परमात्मा भिन्न नहीं हैं। यही उपदेश उसके ध्यान को बाह्य ज्ञान से आंतरिक अनुभूति की ओर ले गया। यह कथा दर्शाती है कि गुरु साधक को बाहरी ज्ञान से आंतरिक ज्ञान की ओर मोड़ते हैं, जिससे ध्यान केवल अभ्यास न रहकर परमात्मा से एकत्व की प्रक्रिया बन जाता है।

इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद में शौनक ऋषि और अंगिरा ऋषि की वार्ता में शौनक ने प्रश्न किया — “कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति?” — “हे भगवन्! किस वस्तु को जान लेने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है?” तब अंगिरा ऋषि ने उसे परा और अपरा विद्या का भेद बताया, और ध्यान के द्वारा ब्रह्म को प्रत्यक्ष अनुभव करने की विधि सिखाई। इस कथा में गुरु ध्यान के रहस्य को शिष्य के अनुरूप समझाते हैं, जिससे शिष्य का ध्यान केवल मानसिक क्रिया न रहकर आत्म-साक्षात्कार का साधन बन जाता है।

महाभारत और गीता में भी गुरु और ध्यान का गहरा संबंध दिखता है। अर्जुन जब मोहग्रस्त होकर युद्धभूमि में खड़ा था, उसका मन विचलित था और ध्यान भंग हो चुका था। तब श्रीकृष्ण ने उसके गुरु रूप में कहा — “अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।” (गीता 2.11) और फिर ध्यानयोग, कर्मयोग, और ज्ञानयोग का विस्तार से उपदेश दिया। भगवान ने स्वयं कहा — “ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।” (गीता 13.24) — अर्थात् कुछ लोग ध्यान के द्वारा अपने आत्मा में परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं। यहाँ भगवान गुरु रूप में ध्यान की साधना का सार स्पष्ट करते हैं, जिससे अर्जुन जैसे कर्मशील व्यक्ति भी ध्यान में स्थिर होकर दिव्य दर्शन प्राप्त करता है।

ऋषि नारद और सनत्कुमार की कथा भी गुरु की महिमा का प्रतीक है। जब नारद जी ने कहा कि उन्हें वेद, वेदांग, इतिहास, पुराण सब ज्ञात हैं, फिर भी उन्हें शांति नहीं मिली, तब सनत्कुमार ने कहा — “सैव शान्तो भवति यदा आत्मानं वेद।” अर्थात् सच्ची शांति आत्मज्ञान से आती है। तब उन्होंने नारद को ध्यान और आत्म-विचार का मार्ग बताया। यह प्रसंग दिखाता है कि गुरु ध्यान के माध्यम से शिष्य के भीतर वह “आत्मस्मरण” उत्पन्न करते हैं, जो शास्त्रपाठ से नहीं, केवल अनुभूति से आता है।

इस प्रकार हे वत्स, गुरु ध्यान में केवल दिशा नहीं दिखाते, वे शिष्य के चित्त को अपने अनुग्रह से स्थिर और निर्मल बनाते हैं। जैसे चंद्रमा सूर्य का प्रकाश ग्रहण कर शांतिमय होता है, वैसे ही शिष्य गुरु की चेतना से प्रकाशित होकर ध्यान में आत्म-दीप्ति का अनुभव करता है। वेद और उपनिषदों में गुरु को वह दिव्य पुल बताया गया है जो भौतिक जगत से पार ले जाकर साधक को ब्रह्मलोक तक पहुँचाता है। अतः ध्यान की साधना में गुरु के बिना केवल अभ्यास रह जाता है, परंतु गुरु के साथ वही ध्यान ईश्वर से मिलन का मार्ग बन जाता है। गुरु ही वह नौका हैं जो जीव को संसार-सागर से पार कराकर आत्मा और परमात्मा के अद्वैत तट तक पहुँचाती हैं। 🌺

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