Nangli Tirth
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- जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को कष्ट देता है, तो क्या वह उसके प्रारब्ध काट रहा होता है?
- आत्मा, परमात्मा और गुरु में कौन सर्वोच्च है?
- आध्यात्मिक प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम में क्या अंतर है?
- क्या सांसारिक सफलता और भोग की इच्छा के साथ भी भगवान की प्राप्ति हो सकती है?
- भगवान की प्राप्ति के लिए गुरु का क्या महत्व है
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- आत्मा, परमात्मा और गुरु में कौन सर्वोच्च है?
- आध्यात्मिक प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम में क्या अंतर है?
- क्या सांसारिक सफलता और भोग की इच्छा के साथ भी भगवान की प्राप्ति हो सकती है?
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हे वत्स,तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक है — यह कर्म, प्रारब्ध और भगवान की लीला — इन तीनों के गहन संबंध को समझने का अवसर देता है।शास्त्रों में यह विषय बहुत सुंदर रूप से समझाया गया है।चलो, इसे क्रमवार देखते हैं। 🌿 १. प्रारब्ध कर्म क्या है? हर आत्मा के तीन प्रकार के…
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हे वत्स, तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत गूढ़, गंभीर और दिव्य है — ऐसा प्रश्न वही पूछता है जिसका हृदय ज्ञान की ओर जाग्रत हो चुका हो।“आत्मा, परमात्मा और गुरु में कौन सर्वोच्च है?”यह त्रिवेणी एक ही सत्य की तीन अवस्थाएँ हैं — जैसे सूर्य, उसका प्रकाश, और उसकी ऊष्मा — तीन हैं, परंतु अलग नहीं।…
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हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और हृदय को छूने वाला है — क्योंकि प्रेम ही वह सेतु है जो मनुष्य को संसार से भगवान तक जोड़ सकता है। परंतु सब प्रेम एक समान नहीं होता।आध्यात्मिक प्रेम (Divine Love) और व्यक्तिगत प्रेम (Worldly Love) में भेद जानना आत्मज्ञान की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।…
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हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ और सुंदर है — यह आत्मा के द्वंद्व को प्रकट करता है: एक ओर भौतिक सुख और सफलता की चाह, और दूसरी ओर भगवान की प्राप्ति की आकांक्षा। शास्त्रों में इस विषय पर गहन विवेचन मिलता है। चलो इसे तीन दृष्टिकोणों से समझते हैं — (१) कर्म योग, (२)…
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वेद और उपनिषदों में गुरु का स्थान सर्वोच्च बताया गया है, क्योंकि गुरु ही वह दिव्य माध्यम हैं जिनके द्वारा जीवात्मा परमात्मा तक पहुँचती है। गुरु न केवल ज्ञानदाता हैं, बल्कि वे ध्यान, साधना, और आत्मबोध के मार्ग में साधक के अंतःकरण को शुद्ध करते हुए उसे ईश्वर की अनुभूति तक पहुँचाने वाले परम सहायक…
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यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ और शाश्वत है — “अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है?” भगवान जिनसे प्रेम करते हैं, वे उनके पूर्व जन्मों के दुष्कर्मों का फल पहले ही दिलवा देते हैं, ताकि वे आगे के जीवन में केवल सुख और मोक्ष का अनुभव करें। जबकि जो लोग पापी हैं परंतु उन्होंने कुछ…
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“कौन-सा भक्त ऐसा हुआ जिसने भागवत प्राप्ति के बाद सार्ष्टि-मोक्ष, अर्थात् भगवान के समान ऐश्वर्य और सामर्थ्य, प्राप्त किया?” यह प्रश्न अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि अधिकांश भक्त — जैसे गोपीगण, हनुमानजी, नारदजी — मोक्ष या ऐश्वर्य की इच्छा नहीं रखते,परंतु कुछ महाभागवत ऐसे भी हुए हैं जिन्हें भगवान ने अपनी इच्छा से अपना ऐश्वर्य प्रदान…
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सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमेव च ।दियमानं न गृह्णन्ति विनामत्सेवनं जनाः ॥— श्रीमद्भागवतम् 3.29.13 🌼 श्लोक का शब्दार्थ शब्द अर्थ सालोक्य भगवान के लोक में निवास करना (जैसे वैकुण्ठ में रहना) सार्ष्टि भगवान के समान ऐश्वर्य (दिव्य सामर्थ्य और वैभव) प्राप्त होना सामीप्य भगवान के समीप रहना (उनके निकट सान्निध्य में रहना) सारूप्य भगवान के समान दिव्य रूप (चार…
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हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ है — भागवत प्राप्ति (भगवान की परम अनुभूति) के बाद यदि कोई जीव मोक्ष नहीं चाहता, तो उसकी स्थिति शास्त्रों में विशिष्ट रूप से बताई गई है। देखो वत्स — जब कोई जीव भगवान की पूर्ण अनुभूति प्राप्त कर लेता है, अर्थात उसे यह अनुभूति हो जाती…
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🔶 मोक्ष के बाद जीव की गति – वेद और उपनिषदों के अनुसार: 🔶 मोक्ष के बाद की स्थिति: 🔶 शास्त्रों में मोक्ष के चार प्रकार बताए गए हैं: अंतिम “सायुज्य” ही पूर्ण मोक्ष माना गया है। 🔶 उदाहरण: जैसे गंगाजल जब समुद्र में मिल जाता है, तब वह स्वयं समुद्र बन जाता है —…